संस्कार भारती, बिहार द्वारा “स्वतंत्रता संग्राम में बिहार की पत्रकारिता और साहित्य” विषय पर ई-परिचर्चा अयोजित

अच्युतानंद मिश्र ने महात्मा गांधी का बिहार आना और चंपारण सत्याग्रह एवं गांधीवादी पत्रकारिता पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि बिहार के पत्रकारों ने गांधीवादी पत्रकारिता को भी आदर्श माना और बिना विज्ञापन के समाचार पत्रों का प्रकाशन भी उनकी प्रेरणा से हुई।

0
85
संस्कार भारती
संस्कार भारती

बिहार की पत्रकारिता और साहित्य ने स्वतंत्रता आंदोलन को दिशा देने का कार्य किया : अच्युतानंद मिश्र

हरिओम कुमार, मोतिहारी। संस्कार भारती, बिहार प्रदेश द्वारा आजादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में “स्वतंत्रता संग्राम में बिहार की पत्रकारिता और साहित्य” विषयक ऑनलाइन परिचर्चा का अयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के पूर्व कुलपति एवं देश के ख्यातिलब्ध वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने की।

ई–परिचर्चा में मुख्य वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की प्रोफेसर एवं हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय की निदेशक प्रो. कुमुद शर्मा थी। विषय प्रवर्तन प्रो. अरुण कुमार भगत, सदस्य लोक सेवा आयोग, बिहार ने किया। सानिध्य एवं संयोजन संस्कार भारती, बिहार के संगठन मंत्री वेद प्रकाश का प्राप्त हुआ। ई-परिचर्चा का संचालन कार्यक्रम संयोजक डॉ. परमात्मा कुमार मिश्र ने की।

अध्यक्षीय उद्बोधन में संस्कार भारती, बिहार के प्रति आभार व्यक्त करते हुए अच्युतानंद मिश्र कहा कि “स्वाधीनता आंदोलन के समय बिहार के पत्रकार सिर्फ बिहार के ही नही बल्कि पूरे देश के पत्रकार थें। स्वाधीनता की पत्रकारिता और साहित्य में बिहार की महत्वपूर्ण भूमिका रही। बिहार की पत्रकारिता और साहित्य ने स्वतंत्रता आंदोलन को दिशा देने का कार्य किया।

अच्युतानंद मिश्र ने महात्मा गांधी का बिहार आना और चंपारण सत्याग्रह एवं गांधीवादी पत्रकारिता पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि बिहार के पत्रकारों ने गांधीवादी पत्रकारिता को भी आदर्श माना और बिना विज्ञापन के समाचार पत्रों का प्रकाशन भी उनकी प्रेरणा से हुई। अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि 1907 से 1920 तक लगभग सभी पत्रकार लोकमान्य तिलक की पत्रकारिता से प्रेरित होकर तिलकवादी पत्रकार बन गए थे। उस समय के साहित्यकारों ने भी स्वतंत्रता के आंदोलन में अपनी रचनाओं से जन जागरण का काम किया।

यह भी पढ़ें -   लालू प्रसाद यादव को जमानत मिलने के बाद भी जेल में ही रहना होगा, जानिए वजह

स्वाधीनता की पत्रकारिता जिस रूप में हुई उसी रूप पर आज के युवा पीढ़ी के सामने लाई जानी चाहिए, उस पर चर्चा होनी चाहिए। बिहार के पत्रकारों में ऊर्जा है। बिहार देशभर के पत्रकारों की उर्वरा भूमि है। वर्तमान में पत्रकारिता के बदले स्वरूप पर उन्होंने कहा कि आज की पत्रकारिता में विश्वसनीयता समाप्त हो गई है। पत्रकारिता व्यापार आधारित हो गई है।

मुख्य वक्ता प्रो. कुमुद शर्मा ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में बिहार प्रांत की भूमिका प्रशंसनीय रही है। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान साहित्य और पत्रकारिता के बीच कोई विभाजन रेखा थी ही नहीं। जो साहित्यकार थे वही पत्रकारिता में आते थे। साहित्य और पत्रकारिता के बीच सामंजस्य था। स्वतंत्रता आंदोलन में बिहार के साहित्यकारों की भी महती भूमिका रही। प्रोफेसर कुमुद शर्मा ने 1857 के स्वतंत्रता आंदोलन की पत्रकारिता पर ईसाई पादरी जेम्स लोंग के बातों पर चर्चा करते हुए कहती है कि जेम्स लोंग भारत के समाचार पत्रों के स्वरूप के बारे में कहते हैं कि “भारत का समाचार पत्र देखने में बहुत साधारण होता है पर वीर काव्य की तरह अपना असर दिखाते हैं।

यह भी पढ़ें -   बिहार में जयदू-राजद फिर आए साथ, जानिए इसपर तेजस्वी यादव ने क्या कहा?

भारतीयों को जगाने में इन देशी समाचार पत्रों की बड़ी भूमिका होती है। इनका प्रसार कम है परंतु प्रभाव ज्यादा है। भारतीय समाचार पत्रों में प्रकट मत खतरों की चेतावनी देता है।” प्रो कुमुद शर्मा ने साहित्यकारों पर चर्चा करते हुए कहती है कि बिहार की धरती ने कई साहित्यकारों को पैदा किया जिसने अपने व्यक्तिगत सुखों को तिलांजलि देकर स्वतंत्रता आंदोलन में महती भूमिका निभाया। उन्होंने बिहार के साहित्यकार राजा राधिका रमन सिंह, रामवृक्ष बेनीपुरी, रामधारी सिंह दिनकर, शिवपूजन सहाय, मोहनलाल मेहता जैसे देशभक्त साहित्यकार और उनकी रचनाओं पर भी चर्चा की।

परिचर्चा में कार्यक्रम के मार्गदर्शक बिहार लोक सेवा आयोग, पटना के माननीय सदस्य प्रोफेसर अरुण कुमार भगत ने अपने उद्बोधन में कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में भाषाई पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1857 की क्रांति के पूर्व पराधीन भारत के पत्रकारों ने देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। स्वाधीनता संग्राम का कालखंड लगभग 121 वर्षों का है। 1826 में भाषाई पत्रकारिता की शुरुआत और 1947 में देश कि स्वतंत्रता तक की पत्रकारिता राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर स्थापित हुई।

प्रो अरुण कुमार भगत ने इस 121 वर्षों की पत्रकारिता के कालखंड को चार भागों में विभाजित करते हुए कहा कि 1826 से 1857 तक प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के पूर्व की पत्रकारिता रही, फिर 1900 तक भारतेंदु युगीन पत्रकारिता का प्रभाव रहा, 1920 तक तिलक की पत्रकारिता का प्रभाव दिखाई देती है और फिर 1920 से 1947 तक गांधी युगीन पत्रकारिता का प्रभाव रहा। उन्होंने कहा कि भाषाई पत्रकारिता के माध्यम से ही स्वाधीनता की पूरी लड़ाई लड़ी गई। उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में बिहार के पांच प्रमुख अखबार बिहार बंधु, पाटलिपुत्र, सर्च लाइट, बिहार टाइम्स एवं आर्यावर्त जैसे समाचार पत्रों के विकास एवं भूमिका पर भी चर्चा किया।

यह भी पढ़ें -   बिहार में नौकरियों की बहार, नए साल में इन विभागों में मिलेगी नौकरी

कार्यक्रम का संयोजन भोजपुरी सांस्कृतिक समूह, संस्कार भारती, बिहार के सह संयोजक डॉ. परमात्मा कुमार मिश्र ने किया। तकनीकी संयोजन उत्तर बिहार प्रांत के महामंत्री सुरभित दत्ता जी ने की।

मीडिया को जानकारी देते हुए कार्यक्रम संयोजक डॉ. परमात्मा कुमार मिश्र ने बताया कि इस परिचर्चा में “स्वतंत्रता संग्राम में बिहार की पत्रकारिता और साहित्य” के विविध आयामों पर सविस्तार से चर्चा की गई। इस परिचर्चा को संस्कार भारती, बिहार के फेसबुक पेज से लाइव प्रसारित किया गया, जिसमें बिहार सहित देशभर से लगभग सैकड़ों लोग सक्रिय रुप से जुड़े रहे।

परिचर्चा के अंत में कार्यक्रम संयोजक डॉ. परमात्मा कुमार मिश्र ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापन किया एवं संस्कार भारती, बिहार के सदस्यों के प्रति आभार प्रकट किए।